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'क्रांति पथ पर' यह पुस्तक भारतीय स्वाधीनता संग्राम में जीवन का बलिदान करने वाले और देश को आजाद करने की उत्कट अभिलाषा वाले क्रांतिकारियों का उत्सर्गपूर्ण गाथा प्रस्तुत करती है। साथ ही प्रथम स्वाधीनता संग्राम और उससे पूर्व अंग्रेजों से और स्थानीय काले अंग्रेजों (जमींदारों)से संघर्ष तथा विभिन्न क्रांतियों का विशद वर्णन किया गया है साथ ही भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों को विस्तृत रूप में प्रस्तुत किया गया है। एक तरह से यह पुस्तक क्रांति का वैज्ञानिक अध्ययन का रूप प्रस्तुत करती है।

Rajpath Par

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अमरनाथ अजेय का यह काव्य-संग्रह राजपथ पर अत्यंत लोकप्रिय कविताओं का संकलन है। 'राजपथ पर' से गुजरते हुए ऐसा जान पड़ता है कि मैं खुद ही मन की गहरी झील में उतर चुका हूं,और वहां सब कुछ तलाशनें की कोशिश कर रहा हूं, जिसे अब तक हासिल नहीं कर पाया हूं। बहुत आसान नहीं होता जंगलों से गुजरना,पत्तों की हरियाली को आत्मसात करना। यह जो मन का हरापन है, अमरनाथ अजेय के गीतों में साफ-साफ देखा जा सकता है। अजेय जी खुद को विश्लेषित करते हुए सामाजिक संरचना को भी विश्लेषित करने का सफल प्रयास अपनी कविताओं में किया है। लोक भूमि की जटिलताओं और शहरातीकरण पर अजेय जी ने कविताओं के माध्यम से गहरी चोट किया है।उनके ही शब्दों में'मेरी कविताओं में जन चेतना के स्तर पर उद्घोष अंतरनिहित है, जो जीवन की खुरदुरी सतहें समतल बनाने,निदाध पतझड़ मे कोपलें फूटने और कोयल के कूकनें का संकेत देती हुई इस संकलन में कविताएं देखी जा सकती हैं।

आजादी के आदिवासी दीवाने

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 'आजादी के आदिवासी दीवाने' नामक यह पुस्तक मेरी प्रकाशित पुस्तकों मे पांचवी पुस्तक है। इससे पहले राजपथ पर, क्रांति पथ पर, धूप लौट आने तक और लोक का आलोक  (समीक्षा पुस्तक) प्रकाशित हो चुकी हैं। इस पुस्तक में आजादी की लड़ाई मे योगदान देने वाले आदिवासी नायकों में भगवान बिरसा मुंडा, तिलका माझी, बुधु भगत, नीलांबर पीतांबर, जतरा भगत उर्फ ताना भगत, सिद्धू कान्हो मुर्मू, शेख भीखारी, शेर अली खान अफरीदी, स्पार्टाकस, रघुनाथमहतो, देवी चौधरानी , महारानी तपस्विनी, क्रांतिवीर भीमा नायक, क्रांतिकारी अमर शहीद उमाजी नायिक, टंट्या मामा भील, झाला सिरहा, गेंदा सिंह एवं शहीद गुंडाधुर की शौर्य पूर्णगाथा का वर्णन है।

लोक का आलोक

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 इस पुस्तक के अतंर्गत लोक साहित्य के मर्मज्ञ साहित्यकार डा.अर्जुन दास केसरी के समस्त पुस्तकों का समीक्षात्मक आलेख है। इसे डॉ. अर्जुन दास जी की पुस्तकों के अध्ययन के लिए प्रवेश द्वार भी कहा जा सकता है। सोनांचल की आदिवासी परंपराओं का संपूर्ण सांस्कृतिक दर्शन इस पुस्तक के द्वारा प्राप्त हो जाता है।